रविवार, 19 अक्टूबर 2014

बेवफा

वो शर्मिन्दा भी नही अपनी बेवफाई पे 

मैं जिंदा हूँ इस लिए, कि बेवफा न था..

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

ज़िन्दगी

मुसलसल हादसों से
कुछ यूँ गुज़री है ज़िन्दगी
कभी आराम से बैठे तो
लगता है कि मर गए हैं

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

चश्मा

जब न था चश्मा मयस्सर तब निगाहें उठती नहीं थीं ।
अब वे आए हैं चश्मा चढ़ा कर निगाह चार करने

बुधवार, 3 सितंबर 2014

अचानक

चलते चलते अचानक पीछे मुङकर देखा...
तो कुछ यादें हँस रहीं थी, और कुछ रिश्ते दम तोड़ रहे थे।

रविवार, 31 अगस्त 2014

मोहलत

तुमने तो कह दिया कि मोहब्बत नहीं मिली.
मुझको तो ये कहने की भी मोहलत नहीं मिली.........